Tuesday, 28 August 2012

पूस में देवघर

देवनगरी बाबाधाम ...यहां बाबा रावणेश्वर शिवलिंग है...सावन के महीने में ये छोटा सा शहर भगवे रंग से पट जाता है...चल कांवरिया बाबाधाम और हर-हर महादेव के जयकारे, बेलपत्तर की हरियांधी महक और एक भाव,एक ही मकसद सबके चेहरे पर पुता...यहां किसी भी गली में दाखिल होईए, वो आपको मंदिर की चौखट तक पहुंचा ही देगी... सावन के अलावे किसी और महीने में जाइए, तो भीड़-भाड़ कम होगी, सहूलियत ज्यादा...सहूलियत के पलों में कैसा दिखता है मुख्य मंदिर का प्रांगण और उसके आस-पास, मोबाइल फोन के कैमरे (2 मेगापिक्सेल, नोकिया) से मैंने यूंही ले ली थीं कुछ तस्वीरें...बहुत हल्की, अच्छा एहसास कराती पूस की एक सुबह...




टोकरी में भरे कमल और गेंदे के फूल, साथ में बेलपत्र...और पत्तों का ही दोना...थोड़ी देर में शंकर-पार्वती, नर्मदेश्वर, विष्णु...किनका स्पर्श हासिल करेंगी ये, इनको पता नहीं...जिनकी गणित अच्छी हो, वे प्रोबेबिलिटी में सिर खपा सकते हैं...




फूलों का दोना सजा रखा है...गो-माता हेल्दी और न्यूट्रिशस डायट की तलाश में...रंग-बिरंगे फूलों का लंच-डिनर अमूमन हो ही जाता है.




















तलाश जारी है...


इट्स ऑल इन द फैमिली























दीवारों पर लिखी इबारत भी, विरासत भी...पुश्त दर पुश्त का हिसाब रखते हैं यहां के पंडित, जो पंडा कहलाते हैं...उनके फोन नंबर हैं...लेकिन नाम अजीब है...लालटेन पंडा ! 


कुछ और भी...


  समझे !!








कुछ लोगों ने अच्छा मतलब निकाला है दीवार पर चस्पा इस निर्देश का... जहां-तहां क्यों थूकें, यहीं थूक डालते हैं !





















आस्था तल्लीनता खोजती है...आप क्या खोजने लगे ?





गूंज-अनुगूंज








प्रसाद


पेड़ों की रूप-रेखा तैयार हो रही है





धूप-बत्ती





मालाओं-बद्धियों के गुच्छे.  पहले काले रंग की गांठनुमा बद्धी यहां की टिपिकल हुआ करती थी.अब रंगों में विविधता आ गई है.  बाज़ारवाद कह लीजीए या लोगों के बदलते टेस्ट का ख्याल भी कह सकते हैं.








...और अब दर्शन कीजिए शिव-पार्वती मंदिर का






शिव-पार्वती




2 comments:

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  2. वाह क्या बात है! देवघर की यादें ताज़ा हो गयी , वो भी हसी की छुरछुरी के साथ :D

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